आज के समय में पारंपरिक खेती से होने वाली आय लगातार घटती जा रही है, बढ़ती लागत मौसम की अनिश्चितता और बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण किसान नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में ‘सतावर’ (शतावरी) की खेती एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है, जो किसानों को कम समय में अच्छा मुनाफा दे रही है,
उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के किसान अमरपाल की कहानी इस बदलाव का अच्छा उदाहरण है। उन्होंने गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों को छोड़कर औषधीय फसल सतावर को अपनाया,
शुरुआत में उन्हें कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन सही जानकारी और मेहनत के दम पर उन्होंने सफलता हासिल की. आज वे सतावर की खेती से लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं।
सतावर एक औषधीय पौधा है. जिसका उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में बड़े पैमाने पर किया जाता है इसकी जड़ों की बाजार में काफी मांग रहती है जिससे किसानों को अच्छा दाम मिलता है. खास बात यह है कि इस फसल को ज्यादा पानी या महंगे खाद-कीटनाशकों की जरूरत नहीं होती जिससे लागत कम आती है। यह फसल करीब 18 महीने में तैयार हो जाती है और एक बार लगाने के बाद कई सालों तक उत्पादन देती है,
विशेषज्ञों के अनुसार, सतावर की खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी और अच्छा जल निकास जरूरी होता है किसान अगर सही तकनीक और बाजार की जानकारी के साथ इसकी खेती करें तो वे अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं, सरकार भी औषधीय फसलों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है, जिससे किसानों को आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण मिल रहा है,
आज के बदलते कृषि परिदृश्य में सतावर जैसी फसलें किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई हैं यह न केवल उनकी आय बढ़ाने में मदद कर रही हैं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही हैं, अगर अन्य किसान भी इस दिशा में कदम बढ़ाएं, तो वे भी अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं और खेती को एक लाभकारी व्यवसाय बना सकते हैं।
एक बीघा में करीब 1200 पौधे लगाए जाते हैं. इसमें बीज, नर्सरी और मजदूरी मिलाकर लगभग 35,000 रुपये का खर्च आता है. लेकिन जब 18 महीने बाद फसल बिकने के लिए तैयार होती है, तो एक बीघे से करीब 1.5 लाख रुपये तक की आमदनी होती है. सारा खर्चा निकालने के बाद भी किसान को एक बीघे पर 1 लाख रुपये से ज्यादा की शुद्ध बचत होती है.
सतावर की खेती बीज के जरिए होती है. एक एकड़ में करीब 5 किलो बीज लगता है, जिसकी पहले नर्सरी तैयार की जाती है और फिर पौधों की रोपाई होती है.
खुदाई के समय जड़ें गीली होती हैं 350 क्विंटल गीली जड़ें सूखने के बाद करीब 35 क्विंटल रह जाती हैं. बाजार में इस सूखी सतावर की कीमत 90,000 रुपये प्रति क्विंटल तक है, जिससे किसानों को सीधा और बड़ा मुनाफा मिलता है.



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