पूसा (समस्तीपुर) कृषि शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित न रखकर खेतों से जोड़ने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल देखने को मिली। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय स्वयं छात्रों के साथ खेत में उतरे और धान की रोपाई में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों को खेती की आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ पारंपरिक कृषि ज्ञान का महत्व भी समझाया।
कुलपति ने कहा कि एक सफल कृषि वैज्ञानिक बनने के लिए केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। खेत में काम करने का अनुभव, किसानों की समस्याओं को समझना और फसल प्रबंधन की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित होना भी उतना ही आवश्यक है।
धान की रोपाई के दौरान विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र मौजूद रहे। सभी ने मिलकर रोपाई की प्रक्रिया को अपनाया और खेती की विभिन्न तकनीकों का अभ्यास किया। इस पहल का उद्देश्य छात्रों को वास्तविक कृषि कार्यों का अनुभव प्रदान करना और उन्हें भविष्य के लिए बेहतर कृषि विशेषज्ञ बनाना है।
डॉ. पांडेय ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि शिक्षा का उद्देश्य ऐसे युवा तैयार करना है जो आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों के अनुभव को जोड़कर कृषि क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित कर सकें। उन्होंने छात्रों से कहा कि वे खेतों में जाकर किसानों के साथ काम करें और उनकी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान खोजें।
विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इस तरह की गतिविधियां छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ाती हैं और उन्हें कृषि के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं। साथ ही, इससे आधुनिक खेती की तकनीकों का प्रसार भी तेजी से होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कृषि विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की व्यावहारिक शिक्षा से भविष्य के कृषि वैज्ञानिकों को बेहतर प्रशिक्षण मिलेगा, जिससे किसानों तक नई तकनीकें अधिक प्रभावी ढंग से पहुंच सकेंगी। यह पहल कृषि शिक्षा और किसानों के बीच की दूरी को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
यदि देश के अन्य कृषि विश्वविद्यालय भी इस मॉडल को अपनाते हैं, तो कृषि शिक्षा और अनुसंधान को नई दिशा मिल सकती है। इससे छात्रों में खेती के प्रति रुचि बढ़ेगी और भारतीय कृषि को आधुनिक, टिकाऊ तथा अधिक लाभकारी बनाने में मदद मिलेगी।



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