नमी खत्म नहीं होगी, खरपतवारों से छुटकारा...गन्ना किसानों के लिए मल्चिंग वरदान, जानिए तरीका
भारत में गन्ने की खेती किसानों की आमदनी का एक बड़ा स्रोत मानी जाती है। लेकिन बढ़ती गर्मी, मिट्टी में नमी की कमी और खरपतवारों की समस्या किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में अब गन्ना किसान “मल्चिंग” तकनीक अपनाकर कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि Sugarcane Farming में मल्चिंग तकनीक किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।
गोंडा जिले के प्रगतिशील किसान हरिओम मिश्रा बताते हैं कि मल्चिंग की मदद से खेत की नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवारों पर भी आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे किसानों को बार-बार निराई-गुड़ाई कराने की जरूरत नहीं पड़ती और फसल स्वस्थ बनी रहती है।
मल्चिंग एक ऐसी कृषि विधि है, जिसमें खेत की मिट्टी को सूखी पत्तियों, फसल अवशेष, भूसा या प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है। गन्ने की खेती में अक्सर किसान कटाई के बाद बचे गन्ने के सूखे पत्तों और अवशेषों का इस्तेमाल मल्चिंग के रूप में करते हैं। इससे मिट्टी सीधे धूप के संपर्क में नहीं आती और नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार Sugarcane Farming में मल्चिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि खेत में पानी की जरूरत कम पड़ती है। गर्मियों में भी मिट्टी जल्दी सूखती नहीं है, जिससे सिंचाई पर खर्च घटता है और किसान की लागत कम होती है।
गन्ने की खेती में खरपतवार एक बड़ी समस्या होती है। ये पौधों से पोषण छीन लेते हैं, जिससे उत्पादन पर असर पड़ता है। लेकिन मल्चिंग तकनीक अपनाने से खेत में सूर्य की रोशनी सीधे जमीन तक नहीं पहुंचती, जिसके कारण खरपतवार तेजी से नहीं उग पाते।
हरिओम मिश्रा बताते हैं कि पहले उन्हें खेत की बार-बार निराई करानी पड़ती थी, जिसमें काफी मजदूरी खर्च होती थी। लेकिन अब मल्चिंग अपनाने के बाद खरपतवारों की समस्या काफी कम हो गई है। इससे समय और पैसे दोनों की बचत हो रही है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ने के सूखे अवशेष धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद में बदल जाते हैं। इससे मिट्टी में कार्बनिक तत्व बढ़ते हैं और जमीन की उर्वरता मजबूत होती है। यही कारण है कि मल्चिंग से गन्ने की फसल अधिक स्वस्थ और मजबूत बनती है।
Sugarcane Farming में इस तकनीक को अपनाने से मिट्टी का तापमान भी नियंत्रित रहता है। तेज गर्मी के दौरान भी पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं, जिससे फसल पर बुरा असर नहीं पड़ता।
स्वस्थ पौधों में रोग कम लगते हैं। मल्चिंग की वजह से मिट्टी की नमी संतुलित बनी रहती है, जिससे पौधों की वृद्धि अच्छी होती है। जब पौधे मजबूत रहते हैं तो उनमें कीट और बीमारियों का खतरा भी कम हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसान सही तरीके से मल्चिंग करें तो रासायनिक दवाओं का उपयोग भी कम करना पड़ता है। इससे खेती पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित बनती है।
गन्ने की बुवाई के कुछ समय बाद खेत में सूखे पत्ते या फसल अवशेष फैला दिए जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि मल्च की परत बहुत मोटी न हो, वरना पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। खेत में समान रूप से मल्च बिछाने से सबसे अच्छे परिणाम मिलते हैं।
कुछ किसान प्लास्टिक मल्चिंग का भी इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन प्राकृतिक अवशेषों से की गई मल्चिंग अधिक सस्ती और लाभदायक मानी जाती है।
आज कई किसान Sugarcane Farming में मल्चिंग तकनीक अपनाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। सिंचाई, मजदूरी और खरपतवार नियंत्रण का खर्च कम होने से मुनाफा बढ़ रहा है। साथ ही उत्पादन में भी सुधार देखने को मिल रहा है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले समय में जल संकट और बढ़ती गर्मी को देखते हुए मल्चिंग तकनीक किसानों के लिए बेहद जरूरी साबित होगी। यह तकनीक कम लागत में अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाए रखती है।



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